⚡️एरिया स्टेटमेंट में 60 फ्लैट का उल्लेख, लेकिन विभागीय स्वीकृति में 90 फ्लैट और 6 मंजिल का नक्शा मंजूर।
⚡️ ‘विकास सिंह’ नामक कथित आर्किटेक्ट, जिसका शहर में कोई अस्तित्व नहीं, उसके नाम पर 400 से अधिक फर्जी नक्शे और 150 फर्जी लेआउट स्वीकृत।
⚡️आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के लिए जमीन का झूठा शपथपत्र देकर विकास अनुज्ञा हासिल करने का आरोप
⚡️ एक ही दिन में 29 लेआउट फाइलों को मंजूरी, जिससे विभागीय मिलीभगत के गंभीर संकेत
⚡️नक्शा और लेआउट पास कराने के नाम पर करोड़ों रुपये के कथित लेनदेन की आशंका।
बिलासपुर । छत्तीसगढ़ की न्यायधानी बिलासपुर में शहरी विकास की आड़ में चल रहे एक बड़े और संगठित भ्रष्टाचार का ऐसा मामला सामने आया है, जिसने नगर पालिक निगम और टाउन एंड कंट्री प्लानिंग (TCP) विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। दस्तावेजों और स्वीकृतियों की परतें खुलने के साथ ही यह मामला केवल एक प्रोजेक्ट की अनियमितता तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि पूरे शहरी नियोजन तंत्र की विश्वसनीयता को कठघरे में खड़ा कर रहा है।
मामला अज्ञया नगर क्षेत्र में प्रस्तावित ‘मेसर्स अनंत रियाल्टी’ नामक प्रोजेक्ट से जुड़ा है। आरोप है कि इस प्रोजेक्ट के माध्यम से बिल्डर *नमन गोयल* ने विभागीय अधिकारियों की कथित मिलीभगत से मास्टर प्लान और निर्माण नियमों को दरकिनार करते हुए शासन को गुमराह किया। दस्तावेजों में सामने आई विसंगतियों के अनुसार इस प्रोजेक्ट के लिए प्रस्तुत एरिया स्टेटमेंट में चार मंजिलों पर केवल 60 फ्लैट बनाने का उल्लेख किया गया था। लेकिन जब विभाग ने उसी प्रोजेक्ट का नक्शा स्वीकृत किया तो उसमें फ्लैटों की संख्या बढ़कर 90 और मंजिलों की संख्या छह दर्शाई गई।
निर्माण नियमों और स्वीकृति प्रक्रियाओं को समझने वाले विशेषज्ञों का कहना है कि एरिया स्टेटमेंट और स्वीकृत नक्शे के बीच इतना बड़ा अंतर सामान्य प्रशासनिक चूक नहीं हो सकता। यह विसंगति इतनी स्पष्ट है कि किसी भी अधिकारी की नजर से छिपना लगभग असंभव है। इसके बावजूद इस तरह का नक्शा पास हो जाना पूरे अनुमोदन तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

इस पूरे मामले का दूसरा चौंकाने वाला पहलू उस आर्किटेक्ट या इंजीनियर का नाम है जिसके माध्यम से यह नक्शा तैयार किया गया। दस्तावेजों में ‘विकास सिंह’ नाम दर्ज है। लेकिन बिलासपुर शहर में इस नाम का कोई पंजीकृत आर्किटेक्ट या इंजीनियर उपलब्ध ही नहीं है। नगर निगम के रिकॉर्ड और पेशेवर संस्थाओं से प्राप्त जानकारी के अनुसार इस नाम का कोई भी व्यक्ति आधिकारिक रूप से वास्तुकार या इंजीनियर के रूप में पंजीकृत नहीं है। यह तथ्य भी सामने आया कि इसी नाम का उपयोग पहले भी कई निर्माण परियोजनाओं के फर्जी नक्शे स्वीकृत कराने के लिए किया गया था। बाद में जब इस पर संदेह गहराया तो नगर निगम ने इस नाम से जुड़े लाइसेंस को निलंबित कर दिया था। इसके बावजूद उसी पहचान के आधार पर एक बड़े प्रोजेक्ट को मंजूरी मिल जाना इस पूरे तंत्र की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
मामले की परतें यहीं समाप्त नहीं होतीं। शहर में हाल ही में अवैध निर्माण के खिलाफ हुई एक कार्रवाई ने इस कथित नेटवर्क की झलक और स्पष्ट कर दी। 13 मई को नगर निगम ने पुराने बस स्टैंड के पास स्थित महुआ होटल पर अवैध निर्माण को लेकर बुलडोजर चलाया था। जब इस होटल के निर्माण से संबंधित दस्तावेजों की जांच की गई तो पाया गया कि इसका नक्शा भी ‘विकास सिंह’ के नाम से स्वीकृत किया गया था।
जांच में सामने आया कि होटल निर्माण के दौरान स्वीकृत नक्शे की कई शर्तों का उल्लंघन किया गया था। ओपन स्पेस और पार्किंग जैसे अनिवार्य प्रावधानों को भी नजरअंदाज कर निर्माण कर लिया गया था। इसके बाद नगर निगम ने 24 जुलाई 2025 को ‘विकास सिंह’ नाम से जुड़े लाइसेंस को ब्लैकलिस्ट कर दिया। जब इस मामले में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ आर्किटेक्ट्स से जानकारी मांगी गई तो उन्होंने स्पष्ट किया कि उनके रिकॉर्ड में इस नाम का कोई पंजीकृत आर्किटेक्ट मौजूद नहीं है।
इस खुलासे के बाद जब विभागीय फाइलों की व्यापक जांच शुरू हुई तो एक और चौंकाने वाला तथ्य सामने आया। पता चला कि शहर में ‘विकास सिंह’ नामक इसी कथित आर्किटेक्ट के माध्यम से 400 से अधिक भवन फर्जी नक्शे और 150 से ज्यादा लेआउट स्वीकृत किए जा चुके हैं। यानी एक ऐसी पहचान, जिसका वास्तविक अस्तित्व ही संदिग्ध है, उसके नाम पर वर्षों तक निर्माण स्वीकृतियां जारी होती रहीं।
इस मामले में एक और गंभीर पहलू आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए आरक्षित आवास से जुड़ा है। नियमों के अनुसार बड़े आवासीय प्रोजेक्ट में EWS वर्ग के लिए फ्लैट आरक्षित करना अनिवार्य होता है। संबंधित प्रोजेक्ट के लिए बिल्डर ने विभाग को एक शपथपत्र दिया था जिसमें दावा किया गया कि ग्राम तिफरा के खसरा नंबर 407/7 पर EWS फ्लैट बनाए जाएंगे। लेकिन जब राजस्व अभिलेखों की जांच की गई तो पता चला कि जिस जमीन पर गरीबों के लिए आवास निर्माण का दावा किया गया है वह जमीन बिल्डर के नाम पर दर्ज ही नहीं है। यानी गरीबों के लिए आवास की व्यवस्था के नाम पर विभाग को कथित रूप से झूठा शपथपत्र देकर विकास अनुज्ञा प्राप्त की गई।
शहरी विकास से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि यदि यह तथ्य सही पाया जाता है तो यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं बल्कि शासन को गुमराह करने का गंभीर मामला बन सकता है। क्योंकि EWS आवास से जुड़े नियमों का उद्देश्य शहरी विकास योजनाओं में गरीब वर्ग को भी आवास उपलब्ध कराना होता है।
जांच के दौरान एक और तथ्य सामने आया जिसने पूरे मामले को और संदिग्ध बना दिया। बताया जाता है कि कुछ मामलों में एक ही दिन में 29 लेआउट फाइलों को मंजूरी दी गई। शहरी नियोजन की प्रक्रियाओं को जानने वाले अधिकारियों का कहना है कि इतनी बड़ी संख्या में लेआउट स्वीकृत करना सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया के तहत लगभग असंभव है। इससे यह आशंका और गहरा जाती है कि कहीं यह पूरा तंत्र एक संगठित नेटवर्क के रूप में तो काम नहीं कर रहा था, जिसमें फाइलों को तेजी से मंजूरी दिलाने के लिए अंदरूनी स्तर पर समन्वय किया जाता था। यदि इस पूरे मामले के आर्थिक पहलू पर नजर डालें तो इसकी गंभीरता और बढ़ जाती है। नगर निगम के आकलन के अनुसार एक एकड़ जमीन के रिहायशी लेआउट को स्वीकृति दिलाने में लगभग 75 हजार से 2.5 लाख रुपये तक का खर्च आता है। वहीं एक सामान्य मकान के नक्शे के लिए 8 हजार से 20 हजार रुपये तक शुल्क लिया जाता है। ऐसे में यदि शहर में 400 से अधिक नक्शे और 150 से ज्यादा लेआउट स्वीकृत किए गए हैं तो यह सवाल स्वाभाविक रूप से उठता है कि इस पूरे खेल में कितनी बड़ी आर्थिक गतिविधि हुई होगी। विशेषज्ञों का मानना है कि यह राशि करोड़ों रुपये तक पहुंच सकती है।
इस पूरे घटनाक्रम ने बिलासपुर के शहरी विकास तंत्र की विश्वसनीयता को गंभीर चुनौती दी है। नागरिकों और सामाजिक संगठनों के बीच भी इस मामले को लेकर चिंता बढ़ रही है कि यदि निर्माण स्वीकृति की प्रक्रिया में इतनी बड़ी अनियमितताएं संभव हैं तो शहर में बनने वाली इमारतों की सुरक्षा और वैधानिकता पर भी प्रश्नचिह्न लग सकता है।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या इस पूरे मामले की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच कराई जाएगी। यदि जांच में यह साबित होता है कि नियमों की अनदेखी कर फर्जी दस्तावेजों के आधार पर मंजूरियां दी गईं, तो संबंधित बिल्डर *नमन गोयल* और विभागीय अधिकारियों के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई की मांग भी तेज हो सकती है।
फिलहाल इस पूरे प्रकरण ने बिलासपुर के रियल एस्टेट क्षेत्र और प्रशासनिक तंत्र दोनों में हलचल मचा दी है। शहर में चर्चा है कि यह मामला केवल एक परियोजना का नहीं बल्कि वर्षों से चल रहे एक बड़े नेटवर्क का संकेत हो सकता है। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि प्रशासन इस कथित नक्शा और लेआउट घोटाले पर कितनी गंभीरता से कार्रवाई करता है और क्या दोषियों की जवाबदेही तय हो पाती है या नहीं।


