CG News: करीब 6,000 करोड़ रुपये के कथित महादेव ऑनलाइन बेटिंग नेटवर्क की जांच में नया मोड़ सामने आया है। ओमान में मौजूद मामले के कथित मुख्य आरोपी सौरभ चंद्राकर ने भारतीय जांच एजेंसियों के साथ सहयोग करने और नेटवर्क से जुड़े लोगों के बारे में जानकारी देने की पेशकश की है। सूत्रों के मुताबिक, उसके दावों में छत्तीसगढ़ के कुछ कथित राजनेताओं, नौकरशाहों और अन्य लाभार्थियों से जुड़ी जानकारी भी शामिल हो सकती है। हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि और साक्ष्यों का सत्यापन अभी बाकी है।
रायपुर। महादेव ऑनलाइन बेटिंग केस में जिस सौरभ चंद्राकर को भारत लाने के लिए जांच एजेंसियां लगातार प्रयास कर रही हैं, अब उसी की ओर से जांच में सहयोग का प्रस्ताव सामने आने की बात कही जा रही है। चंद्राकर ने कथित तौर पर ओमान के अधिकारियों के समक्ष भारतीय एजेंसियों को जानकारी देने की इच्छा जताई है।
मामले में भारत पहले ही उसके प्रत्यर्पण के लिए कानूनी और कूटनीतिक विकल्पों पर काम कर रहा है। जुलाई में भारतीय एजेंसियों के प्रयासों के बीच चंद्राकर के ओमान में हिरासत में होने की खबर सामने आई थी और उसके खिलाफ इंटरपोल रेड नोटिस का भी उल्लेख जांच रिपोर्टों में किया गया है।
सहयोग के बदले सुरक्षा की शर्त
The Hitavada की रिपोर्ट के मुताबिक, चंद्राकर ने ओमान के अधिकारियों के सामने भारतीय एजेंसियों के साथ सहयोग करने की इच्छा जताई है। उसने कथित तौर पर अपने और परिवार की सुरक्षा, नेटवर्क से जुड़े लोगों से अलग सुरक्षित हिरासत, पूछताछ की न्यायिक निगरानी, इलेक्ट्रॉनिक और दस्तावेजी साक्ष्यों के संरक्षण तथा सक्षम अदालत के सामने बयान दर्ज कराने का अवसर मांगा है।
उसने कथित तौर पर राजनीतिक प्रतिशोध से सुरक्षा की मांग भी की है। हालांकि, यह स्पष्ट करना जरूरी है कि किसी आरोपी द्वारा लगाए गए आरोप अपने आप में प्रमाण नहीं होते। यदि वह किसी नेता, अधिकारी या अन्य व्यक्ति का नाम लेता है, तो उसके दावे और साक्ष्यों की स्वतंत्र जांच जरूरी होगी।
अब एजेंसियों के सामने सबसे बड़ा सवाल- प्रस्ताव कितना मजबूत?
बताया जा रहा है कि चंद्राकर की ओर से किया गया प्रस्ताव भारतीय अधिकारियों तक पहुंचा है और संबंधित एजेंसियां इसकी कानूनी और व्यावहारिक संभावनाओं का परीक्षण कर रही हैं।
चंद्राकर की सहयोग की पेशकश से उसकी लंबित आपराधिक मामलों में कानूनी स्थिति अपने आप नहीं बदलती। वह अभी भी जांच एजेंसियों के लिए आरोपी है और उसके खिलाफ चल रही कार्रवाई अपनी जगह कायम रहेगी।
फर्जी पासपोर्ट ने भी खोले कई सवाल
चंद्राकर के ओमान पहुंचने से जुड़ा कथित फर्जी इंडोनेशियाई पासपोर्ट भी जांच का अहम हिस्सा बना हुआ है। अधिकारियों के मुताबिक, एक कथित फर्जी दस्तावेज में चंद्राकर की तस्वीर के साथ “Ajanta Mendis” नाम दर्ज था। यह नाम श्रीलंका के पूर्व क्रिकेटर Ajantha Mendis के नाम से सिर्फ एक अक्षर अलग है। जांच रिपोर्टों के अनुसार, दस्तावेज में चंद्राकर की तस्वीर थी और उसे इंडोनेशियाई नागरिक के रूप में दिखाया गया था।
जांचकर्ताओं को आशंका है कि यह कथित फर्जी पासपोर्ट UAE में उसकी हिरासत से काफी पहले तैयार किया गया था और उसके पास एक से अधिक जाली यात्रा दस्तावेज भी हो सकते हैं।
इस राष्ट्रीय स्तर की बड़ी डेवलपमेंट को सबसे पहले मध्य भारत के प्रमुख अंग्रेजी समाचार पत्र The Hitavada के Chhattisgarh Edition ने अपनी Exclusive Investigation में उजागर किया है।
यह खबर The Hitavada के Deputy Resident Editor और छत्तीसगढ़ के चर्चित Investigative Journalist Mukesh S Singh ने ब्रेक की। रिपोर्ट में मामले से परिचित सूत्रों और ओमान में चल रही प्रत्यर्पण प्रक्रिया से जुड़े घटनाक्रम के आधार पर चंद्राकर के कथित प्रस्ताव का खुलासा किया गया है।
वरिष्ठ खोजी पत्रकार मुकेश एस. सिंह ने अपने X हैंडल पर भी सामने रखा। पोस्ट सामने आते ही मामले ने फिर तूल पकड़ लिया। दावा है कि ओमान में मौजूद सौरभ चंद्राकर अब भारतीय जांच एजेंसियों के सामने ‘नाम खोलने’ और महादेव नेटवर्क से जुड़े कथित राज बताने को तैयार है, लेकिन इसके बदले उसने खुद और परिवार की सुरक्षा मांगी है। अब असली सवाल यही है—चंद्राकर के पास आखिर कितने बड़े नाम और उनके खिलाफ कितने पुख्ता सबूत हैं? अगर उसके दावे जांच में सही साबित होते हैं, तो करीब 6 हजार करोड़ रुपये के कथित महादेव सट्टा मामले में जांच की दिशा और कई चेहरों की मुश्किलें दोनों बदल सकती हैं।
दो पहचान, दो जन्मतिथियां
जांच में कथित पासपोर्ट रिकॉर्ड में पहचान को लेकर भी अंतर सामने आया है। एक तरफ कथित इंडोनेशियाई दस्तावेज में “Ajanta Mendis” नाम और 11 मार्च 1998 की जन्मतिथि बताई गई है, वहीं उसके अपने नाम वाले रिकॉर्ड में Saurabh Chandrakar, जन्मस्थान भिलाई, छत्तीसगढ़ और जन्मतिथि 13 जनवरी 1995 बताई गई है।
यही कथित पहचान संबंधी अंतर अब जांच का अहम हिस्सा बन गया है।
प्रत्यर्पण के साथ दूसरे रास्तों पर भी नजर
भारत और ओमान के बीच प्रत्यर्पण व्यवस्था के तहत चंद्राकर को भारत लाने की प्रक्रिया पर काम चल रहा है। भारतीय एजेंसियां प्रत्यर्पण के अलावा Deportation और मुकदमे के लिए अस्थायी रूप से भारत को सौंपे जाने यानी Temporary Surrender जैसे विकल्पों की कानूनी संभावनाओं को भी देख रही हैं।
CBI, ED और विदेश मंत्रालय समेत संबंधित एजेंसियां इस मामले में कानूनी और कूटनीतिक स्तर पर समन्वय कर रही हैं। जुलाई में CBI द्वारा महादेव ऐप से जुड़े मामलों में छह चार्जशीट दाखिल किए जाने की भी रिपोर्ट सामने आई थी।
2004 की भारत-ओमान प्रत्यर्पण संधि का सहारा
चंद्राकर के प्रत्यर्पण के लिए भारत-ओमान प्रत्यर्पण संधि अहम कानूनी आधार है। भारत और ओमान के बीच इस संधि पर 26 दिसंबर 2004 को मस्कट में हस्ताक्षर हुए थे और 14 सितंबर 2005 को अनुसमर्थन दस्तावेजों का आदान-प्रदान किया गया था।
भारतीय एजेंसियां चंद्राकर को भारत लाने के लिए इसी कानूनी ढांचे के तहत आगे बढ़ रही हैं।
6 हजार करोड़ के कथित नेटवर्क में पहले ही कई कार्रवाई
महादेव ऑनलाइन बेटिंग मामले में ED और अन्य एजेंसियां लंबे समय से जांच कर रही हैं। जांच में कथित तौर पर ऑनलाइन बेटिंग नेटवर्क, पैनल और शाखाओं के जरिए संचालन तथा पैसों के लेन-देन की बात सामने आई है। ED ने मामले में चंद्राकर से जुड़े करीब 1,700 करोड़ रुपये की संपत्तियां अटैच किए जाने की जानकारी भी दी है।
CBI ने भी मामले से जुड़े कथित अवैध बेटिंग और भ्रष्टाचार मामलों में कई आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की है।
अब असली सवाल- नाम कितने और सबूत कितने?
अगर सौरभ चंद्राकर वास्तव में जांच एजेंसियों के सामने दस्तावेज, इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड, वित्तीय लेन-देन या अन्य सत्यापन योग्य साक्ष्य रखता है, तो यह महादेव केस की जांच को नई दिशा दे सकता है।
लेकिन फिलहाल कहानी का सबसे बड़ा हिस्सा अभी सवाल ही है—
चंद्राकर किन लोगों के नाम बताने वाला है? उसके पास उनके खिलाफ क्या सबूत हैं? क्या उन सबूतों की स्वतंत्र पुष्टि हो पाएगी? और क्या यह सहयोग की वास्तविक पेशकश है या अपनी कानूनी स्थिति मजबूत करने की रणनीति?
इन सवालों के जवाब आने वाले दिनों में सामने आएंगे। फिलहाल इतना जरूर है कि महादेव बेटिंग केस में सौरभ चंद्राकर की कथित ‘नाम खोलने’ की पेशकश ने जांच की दिशा में एक नया मोड़ पैदा कर दिया है।

